शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।

वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।।

जिन्दगी वही अच्छी होती है, जो देशधर्म पर मिटती है।

यूं कटने को आयु कुत्ते बिल्ली की भी कटती है।।

हमारी संस्कृति में पता नहीं ऐसी क्या अनोखी बात है कि इसको जितना भी दबाया गया मिटाया गया। परन्तु आज भी ज्यों को त्यों विद्यमान है। यह इस देश की रज के कण-कण में समाई हुई है। तभी तो इसकी रक्षा के लिए कभी चित्तौड़ के किले में हजारों चिताएँ जली, कभी वीरों ने घास की रोटियॉं खाई, माताओं और बच्चों ने भी अपने जीवन की सुकुमार कलियों को स्वयं अपने ही हाथों मसलकर मातृभूमि पर चढाया। किसी प्रकार का लालच या भय हमारे वीरकुमारों को नहीं डिगा पाया और समय आने पर हम दीवारों में चिने जाने या सिर भेंट करने में भी पीछे नहीं रहे। सरहिन्द की दीवारें औरंगजेब की क्रूरता का पुकार-पुकार का बखान कर रही हैं।

सियालकोट के मकतब (विद्यालय) में नादान बच्चों की लड़ाई ने वह गुल खिलाया जो आज भी इतिहास में मुस्लिम राज्य की क्रूरता बखान करता है। मुस्लिम लड़कों ने हकीकतराय को गालियॉं दी तो उसने भी उसी रूप में बीबी फातिमा को गाली दे दी। इस पर मौलवी ने हकीकत की खूब पिटाई की और सब हाल लिखकर काजी के पास भेजा। काजी ने हुकम दिया यदि हकीकतराय तोबाह करके इस्लाम ग्रहण कर ले तो छोड़ दिया जाए, नहीं तो उसकी गर्दन उड़ा दी जाए। मुकदमा सियालकोट के हाकिम अमीर बेग के पास गया। काजियों की क्रूरता के आगे सूबेदार कुछ न कर पाया और उसने हकीकत का सिर काटने का आदेश दे दिया।

हकीकत के माता-पिता और बाल वधु ने विलाप करते हुए दया के लिए प्रार्थना की। हकीकत को मुस्लमान होने के लिए मनाने लगे। परन्तु आर्यवीर ने निडरता से "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि अर्थात्‌ मुझ आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते" यह कहकर मुसलमान होकर जीने से मरना बेहतर समझा। उसने गरजते हुए कहा-

धर्म पर मर मिटूँगा मैं धर्म ही मुझको प्यारा है।

यही हमदर्द है मेरा यही मेरा सहारा है।।

दुखी माता पिता विलाप करते रहे, पर वहॉं उनकी सुनने वाला कौन था। जल्लाद हकीकत का हाथ पकड़ कर ले गया। उसकी भोली सूरत, निष्पाप नेत्र, अल्प अवस्था और हॅंसते हए चेहरे को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर पड़ी। हकीकत ने तलवार उठाकर जल्लाद को दी और कहा-"इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, तू अपने मालिक के आदेश का पालन कर।"

जल्लाद ने विवश होकर न चाहते हुए भी आँख मींचकर तलवार के एक ही वार से हकीकत का सिर धड़ से जुदा कर दिया और उसे सदा के लिए अमर कर दिया।

ऐसे वीर कभी नहीं मरते, सदा अमर रहते हैं। मौत भी विजय हार लिये ऐसे वीरों का वरण करने के लिए प्रतीक्षा करती रहती है।

साहसी को बल दिया है मृत्यु ने मारा नहीं है,

राह ही हारी सदा राही कभी हारा नहीं है।

बिजलियॉं कब काली घटाओं से रोके रुकी हैं,

डूबते देखे भॅंवर ही डूबती धारा नहीं हैं।

जो व्यथाएँ प्रेरणा दें उन व्यथाओं को दुलारो,

जुझकर कठिनाइयों से रंग जीवन के निखारो।

दीप बुझ-बुझकर जला है, वृक्ष कट-कटकर बढा है,

मृत्यु से जीवन मिले तो, आरती उसकी उतारो।।

परन्तु आज उन वीरों की सन्तान बिना समझे धर्म निरपेक्षता के पीछे ही दौड़ लगा रही है। क्या गाय का वध, शराब का प्रचार, दूरदर्शन या समाचार पत्रिकाओं द्वारा नग्नता का प्रचार, अण्ड मांस आदि का प्रचार करना धर्म निरपेक्षता है। राजकीय विद्यालयों में अर्ध नग्न अभिनेत्रियों के चित्रों से युक्त पत्रिका तथा समाचार पत्र मंगाने की अनुमति तो है परन्तु सत्य, दया, न्याय आदि धार्मिक विषयों के प्रचारक समाचार पत्रों पर रोक लगाई जाती है। पता नहीं इस देश के सौभाग्य का सूर्य कब उदय होगा! सच्चरित्रता के चन्द्रमा को राहू कब अपने क्रूर पाशों से छोड़ेगा। हे प्रभो! मेरे देश के लोगों को सद्‌बुद्धि प्रदान करो। -राजेश कुमार

 

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वैदिक संस्कृति में तलाक का विधान नहीं।
Ved Katha Pravachan - 84 (Explanation of Vedas) वेद कथा - प्रवचन एवं व्याख्यान Ved Gyan Katha Divya Pravachan & Vedas explained (Introduction to the Vedas, Explanation of Vedas & Vaidik Mantras in Hindi) by Acharya Dr. Sanjay Dev

 

 

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