धर्म और मजहब पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। स्मृतियों में देखिये। उनमे उन चीजों का नामांकन मिलेगा जो धर्म के अन्तर्भूत हैं। कुछ ऐसी बातें हैं जिनकों धर्म का लक्षण कहा गया है और सार्वभौम तथा सर्ववर्णिक धर्म कहा गया है। अर्थात्‌ ये ऐसी बातें हैं जो सब मनुष्यों के लिए धर्म हैं। इस सूची में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, दया, क्षमा, शौच, आर्जव के  नाम आते हैं।

कहीं किसी सूची में भी शैव, शाक्त या वैष्णव होने की या संस्कृत भाषा में किन्हीं स्तोत्रों के पाठ करने की चर्चा नहीं आती। ऐसी बातों को देखने सेे तो यह बात मन में उठती है कि कोई भी भला आदमी हिन्दू कहा जा सकता है। एक दृष्टि से यह बात ठीक है। परन्तु कुछ ऐसी बातें हैं जिनको मानना हिन्दू के लिए अनिवार्य है। हिन्दू ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता हो या न करता हो परन्तु उसके लिए आत्मा की सत्ता को स्वीकार करना आवश्यक है। आत्मा की सत्ता को मानना ही धर्म का मूल है। धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है और धर्म ही मोक्ष की ओर ले जाता है। जिसको आत्मा पर आस्था नहीं उसके लिए धर्म-पथ पर चलना कठिन है। ऐसा कोई हिन्दू न होगा जो व्यावहारिक दृष्टि से ईश्वर के विराट्‌ स्वरूप की सत्ता को स्वीकार न करता हो। सब प्राणी ईश्वर की विराट्‌ सत्ता के आधीन हैं। सब एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं। सब के सुख-दु:ख एक दूसरे के दु:ख-सुख पर निर्भर हैं, ऐसा हिन्दू मात्र को मान्य है। इसलिए न केवल प्राणिमात्र में वरन्‌ सम्पूर्ण जगत्‌ में उसको एक प्रकार से ईश्वर की झलक दीख पड़ती है। अशिक्षित हिन्दू का हृदय भी कहता है कि-

 

       सियाराम मय सब जग जानी।

       करौं प्रनाम जोरि युग पानी।।

एक बात और है। हिन्दू के हृदय पर कर्म सिद्धान्त की अमिट छाप बैठी हुई है। भले ही किसी घोर विपत्ति में फंसकर वह ईश्वर या किसी देव-देवी को याद करे। यह भी हो सकता है कि बहुत कष्ट की अवस्था में उसके मुंह से दैव जगत्‌ के सम्बन्ध में कोई शिकायत या निन्दा के वाक्य निकल जाएं, परन्तु प्रत्येक हिन्दू के हृदय में यह बात बैठी हुई है कि-

       कर्म प्रधान विश्व करि राखा।

       जो जस करहि सो तस फल चाखा।।

-डा. सम्पूर्णानन्द (पूर्व राज्यपाल)

 

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