दिव्ययुग अगस्त 2009 इन्दौर Divyayug indore August 2009
स्वतन्त्रता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है
लेखक- आचार्य डॉ. संजयदेव
स्वतन्त्रता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।' यह कोई राजनीतिक नारा अथवा कोरा नीति वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य की एक स्वाभाविक आकांक्षा का प्रतीक है। जिस प्रकार एक ही माता-पिता की प्रत्येक सन्तान का अपने माता-पिता की सम्पत्ति पर बराबर-बराबर अधिकार होता है, उसी प्रकार एक ही ईश्वर की सन्तान प्रत्येक मनुष्य का भी प्रकृति की प्रत्येक वस्तु पर समान अधिकार होता है। किन्तु "जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत के अनुसार सृष्टि के आरम्भ से ही कुछ व्यक्ति अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते आये हैं तथा शासक और शासित इन दो वर्गों का निर्माण करके संसार में अशान्ति के बीज बोते आए हैं। कोई अपनी शारीरिक शक्ति के बल पर, तो कोई अपने बुद्धिबल के सहारे अपने से दुर्बल शरीर और अल्प बुद्धि वाले लोगों को अपने आधीन करता आया है और उन पर मनमाना शासन भी करता रहा है।
किन्तु शारीरिक और मानसिक शक्ति से भी बढ़कर एक शक्ति होती है और वह है संगठन शक्ति। जब-जब शासकों के अत्याचार बढ़े हैं, तब-तब इसी संगठन-शक्ति के सहारे शासितों ने विद्रोह करके अपने को शासकों के चंगुल से मुक्त किया है। मनुष्य को स्वतन्त्रता अपने प्राणों से भी प्यारी होती है। भारतवासियों ने यह स्वतन्त्रता बड़े संघर्षों के बाद प्राप्त की है।
Divya yug founder Acharya Sanjay Dev दिव्य युग इन्दौर अगस्त 2009