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 Skip Navigation Linksहोम पेज : वेद, वैदिक संस्कृति एवं वर्तमान सन्दर्भ : सम्मिलित प्रार्थना

वेद- सौरभ
सम्मिलित प्रार्थना
लेखक- स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

ओ3म्‌ सुखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत ।
शिशुं न यज्ञै: परि भूषत श्रिये।।
(ऋग्वेद 9।104।1सामवेद 568)
 शब्दार्थ- (सखाय:) हे मित्रो !  (आ निषीदत) मिलकर बैठो । (पुनानाय) हमारे त्रिविध तापों और मलों का शोधन करनेवाले परमात्मा के लिए (प्र गायत) उत्तम रूप से गान करो । (श्रिये) कल्याण के लिए (शिशुम्‌ न ) जैसे माता बालक को अलंकृत करती है,उसी प्रकार बालक को (यज्ञै:) यज्ञों के द्वारा (परिभूषत) पूर्णरूपेण अलंकृत करो ।
 
भावार्थ- इस मन्त्र में सामूहिक प्रार्थना का विधान किया गया है । वैदिक धर्म केवल मन्दिर तक सीमित नहीं है । यह तो वैयक्तिक और पारिवारिक धर्म है ।  वैदिक कर्मकाण्ड का पूरा अनुष्ठान  घर में ही होता है। वैदिक धर्म के पंचमहायज्ञ- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ और बलिवैश्वदेवयज्ञ घर पर ही करने होते हैं । मन्त्र में सम्मिलित प्रभु-उपासना का उपदेश दिया गया है । मन्त्र का भाव यह है-
 1. हे मित्रो ! आओ, मिलकर बैठो और ईश्वर का स्तुति-गान करो । सामुहिक प्रार्थना में छोटे-बड़े, मित्र-अतिथि, नौकर-चाकर सबको बैठकर प्रभु-गान करना चाहिए।
 2. मन्त्र में दूसरी बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । जैसे माताएँ बच्चे को अलंकृत करती हैं, उसी प्रकार बच्चों को आरम्भ से ही उपासना, यज्ञ आदि के संस्कारों से भी संस्कृत करना चाहिए । जो बच्चे छोटे हों, स्तन-पान करते हों उन्हें भी सामुहिक प्रार्थना और यज्ञों में बैठना चाहिए । उनके जीवन पर शुभ संस्कार पडकर उनके जीवन चमक और दमक उठेंगे ।

 

 

      
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