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 Skip Navigation Linksहोम पेज : वेद, वैदिक संस्कृति एवं वर्तमान सन्दर्भ : आत्म-राज्य

वेद-सौरभ
आत्म-राज्य

व्याख्याकार- स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

ओ3म्‌ प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो न यंसते ।
इन्द्र नृम्नं हि ते शवो हनो वृत्रं ज्या अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्‌।।
            सामवेद 413

शब्दार्थ- (इन्द्र) हे ऐश्वर्यशालि-आत्मन्‌ । (प्रेहि) आगे बढ (अभि इह) अपने लक्ष्य की ओर गति कर (धृष्णुहि) विघ्न और बाधाओं को मार भगा । (ते वज्र:) तेरी गति को (न नियंसते) रोका नहीं जा सकता, तेरे बल को कोई दबा नहीं सकता (ते शव:) तेरा बल (हि) सचमुच (नृम्नम्‌) शत्रुओं को दबानेवाला है । अपने शत्रुनाशक बल से (वृत्रम्‌ हन:) तू अविद्या, अज्ञान और अन्धकार को दूर भगाकर (अप:जय) उन दुष्कर्मों, दुष्प्रवृत्तियों पर जय प्राप्त करके (अर्चन्‌) साधना करता हुआ (स्वराज्यम्‌ अनु) आनन्द को प्राप्त कर ।

भावार्थ-प्रस्तुत मन्त्र में आत्मसाक्षात्कार के लिए क्या-कुछ तैयारी करनी पड़ती है, इसका दिग्दर्शन सुन्दर ढंग से कराया गया है ।
 1. आत्मिक आनन्द की प्राप्ति के लिए तू आगे बढ, अपने लक्ष्य की ओर गति कर ।
 2. आत्मानन्द-प्राप्ति के मार्ग में जो बाधाएं आएं, उन सबको मार भगा।
 3.तू यह मत सोच कि यह कार्य कठिन है । यह कार्य कठिन नहीं है, क्योंकि तेरी गति अबाध है । तुझे कोई रोक नहीं सकता, कुवृत्तियॉं तुझे दबा नहीं सकती ।
 4. तू शत्रुओं का संहारक है । अत: सभी प्रवृत्तियों को दबाता हुआ तू आत्म-राज्य, आत्मिक आनन्द को प्राप्त कर ।·

      
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