वैदिक विनय
भगवत् स्तोता संसार-महासागर से तरते हैं
व्याख्याकार-पण्डित अभयदेव विद्यालंकार
ओ3म् तरत् स मन्दी धावति धारया सुतस्यान्धस: ।
तरत् स मन्दी धावति ।। ऋग्वेद 9.58.1।।
ऋषि:वत्सार:। देवता पवमान: सोम:।। छन्द: निचृद्गायत्री।।
विनय- हे दु:ख और पाप से तरना चाहने वाले भाइयो ! देखो, कई हैं, जोकि तर गये हैं । इस दुस्तर दीखने वाले संसार-महासागर से तरा जा सकता है, सचमुच तरा जा सकता है, पर तरता वह है जोकि मन्दी है । क्या तुम भगवान् की भक्ति-स्तुति में रमनेवाले हो ? क्या इस भजनरस से तुम्हारा अन्त:करण तृप्त हो गया हैं ? क्या तुम्हारा अपना आन्तर (अन्दर ) आनन्द से परिपूर्ण हो गया है ? अर्थात् तृप्त होकर तुम्हें अब संसार की अन्य किसी वस्तु की, किसी भी वस्तु की, कामना नहीं रही हैं ? क्या तुम ऐसे मस्त हो गये हो? ऐसे आत्माराम हो गये हो ? मन्दी होने के लक्षण तो ये ही हैं । देखो, ऐसे मन्दी तरते जा रहे हैं और तर गये हैं ।
यह अवस्था कैसे प्राप्त होती है ? जब भजन करने से अन्दर सोई पड़ी हुई शक्ति जागती है तो वह प्राण,वाणी और मन को उज्जीवित करती हुई ऊपर की तरफ चढने लगती है । हठयोगियों की परिभाषा में इसे कुण्डलिनी का जागरण और प्राणोत्थान कहते हैं । इस कुण्डलिनी का वास्तविक जागरण ही तरना शुरू करना है । प्राण की धारा मूलाधार से उठकर ऊपर चढने लगती है। हैमवती शक्ति नाचती-कूदती हुई, भजन-स्तुति करती हुई मार्ग में प्राण, वाणी, मन के अद्भुत चमत्कार दिखाती हुई ऊपर, अपने शिवरूप स्वामी की ओर चढने लगती है । यह आध्यान अर्थात् मानसिक चेतना से युक्त प्राणधारा के रूप में क्रमश: ऊपर जाती हुई अनुभूत होती है । यही अन्धस् (सोम) की धारा है, जिसके साथ-साथ आत्मा ऊँचा होता जाता है । इसी धारा के साथ मन्दी नामक भक्त की ऊर्ध्वगति होती है । प्रसिद्ध सात लोक सब अन्दर हैं । उन्नत होता हुआ आत्मा इन सब लोकों को पार करता हुआ सत्य लोक में पहुँचकर पूर्ण स्वतन्त्र हो जाता है, बिल्कुल पार तर जाता है । प्राण, वाणी, मन आदि शक्तियॉं शिर के सत्यलोक में जाकर ठहर जाती हैं और समाधि हो जाती है । इस प्रकार देखो ! मन्दी (भगवान का भक्त) दु:खसागर को तर जाता है, ऊ पर पहुँच जाता है । अहो ! इस पुण्य घटना का विचार करना, इसे कल्पना की आँखों से देखना भी कितना ऊँचा उठाने वाला है। तरत् स मन्दी धावति।।
शब्दार्थ- मन्दी= जो भक्ति-स्तुति करने वाला, स्वयं तृप्त, आनन्दमग्न पुरुष होता है स:=वह तरत्= तर जाता है स: वह सुतस्य= उत्पन्न की गई अन्धस:= आध्यानयुक्त प्राण व वाणी की धारया= धारा के साथ धावति=ऊपर वेग से उठता जाता है । स: मन्दी= वह आनन्द तृप्त तरत्= तर जाता है,धावति= ऊर्ध्वगति द्वारा ऊपर चढ जाता है ।·