आचार्य डॉ. संजयदेव के प्रवचनों से संकलित
युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति
आज जहां देश में दहेज प्रथा, बलात्कार, रिश्वतखोरी तथा जमाखोरी जैसे भ्रष्टाचार, विभिन्न प्रकार के घोटाले फैल रहे है, वहां एक ओर रोग पनप रहा है, वह है, नौजवानों में नशे की बढ़ती हुई आदत। प्रतिदिन देखने में आता है कि नौजवान नशे में चूर रहता है। वह दिनभर में बीडी व सिगरेट के पैकेट के पैकेट खाली कर देता है। सांप के विष से भी भयंकर शराब आंख बन्द करके पी जाता है। जब उसे रात को नींद नहीं आती तो नशे की गोलियों का सेवन करता है।
जवानो जवानी में चलना सम्भल कर,
यह आती नहीं फिर एक बार जाकर।
यह शरीर परमात्मा की अमानत है। मनुष्य योनि पाना सौभाग्य की बात है, इसे सही सलामत रखना ही इबादत (भक्ति) है। इसको बुराइयों से और बीमारियों से बचाकर रखना चाहिये। नशीली वस्तुएं शरीर को जर्जर बना देती हैं। इसके सेवन से बल, बुद्धि, आयु व धन का सर्वनाश होता है।
युवको! दुर्दशा और दुर्गति से बचने के लिए, आओ! आज ही सब मिलकर प्रतिज्ञा करें कि हम कभी नशा नहीं करेंगे। इन जानलेवा पदार्थों से बहुत दूर रहेंगे। यदि सुबह का भूला हुआ शाम को घर आ जाए, तो वह भूला नहीं कहलाता। यदि आपने अभी से अपने को सुधारने की चेष्टा नहीं की तो बरबाद होने के बाद पछताने से कोई लाभ नहीं होगा। एक उर्दू के शायर ने भी लिखा है।
होश अब आया है घर का, घर उजड़ जाने के बाद।
शौक उड़ने का हुआ है, पर कतर जाने के बाद॥
मनुष्य को युवावस्था से ही धार्मिक बनना चाहिए, क्योंकि यह जीवन निश्चय ही अनित्य है।-महाभारत