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 Skip Navigation Linksहोम पेज : सम-सामयिक : यौवन की व्यथा

आचार्यश्री डॉ. संजय देव के प्रवचनों से संकलित दिव्य संदेश
यौवन की व्यथा

ज का युवक दो राहों पर खड़ा है। एक मार्ग है आदर्श, किन्तु कण्टकाकीर्ण और दूसरा है यथार्थपरक, किन्तु घृणित और भीड़ भरा। बेचारा यह युवक बड़े पेशोपेश में पड़ा सोच नहीं पाता कि किधर कदम बढाये। जिसे सौभाग्यवश आदर्शोन्मुख और उत्तम शिक्षा मिली है, जिसे सदाचारियों, देशभक्तों के व्यक्तित्व-कृतित्व ने प्रभावित किया है और जिसने अपने निश्छल-निर्विकार मस्तिष्क में घूसखोरी, लम्पटता और विविध भ्रष्टाचरण के प्रति घृणा का भाव उपजा लिया है, वह निस्संदेह किंकर्त्तव्यविमूढ हो गया है।

चारों ओर व्याप्त है लूट-खसोट, आपाधापी। सर्वत्र निर्बल का शोषण। ऐसी परिस्थिति में प्रत्येक युवक चाहता है कि वह येन-केन प्रकारेण सशक्त-समर्थ हो जाये। किन्तु समर्थ होने की प्रक्रिया है बडी निन्दनीय। स्वस्थ शरीर, अच्छे विचार, उत्तम चरित्र के बल पर सफलता पाना अब स्वप्न हो गया। समाज में वर्चस्व तो दूर रहा, अस्तित्व बनाने के लिये ही कितने छल-कपट, चाटुकारिता और नाटकीयता की आवश्कता पड़ती है। बसों में, रेलों में, सरकारी सेवाओं में, व्यापार में, अभिनय में, राजनीति में जो स्थान पाने में सफल हो जाते हैं, वे ही बन जाते है युवकों के प्रेरणास्त्रोत।

विडम्बना तो यह है कि एक ओर तो युवकों को नैतिकता का पाठ पढाया जा रहा है, दूसरी ओर उन्हें अनैतिकता के गर्त में धकेला जा रहा है। लगता है युवक विवेकहीन होता जा रहा है। क्या अच्छा है क्या बुरा, यह निर्णय कर पाना कठिन हो गया है।

किसान का बेटा खेती नहीं करना चाहता, गांव में नहीं रहना चाहता। यह किसानों के प्रति गुण्डों, पुलिस कर्मियों और अन्य कर्मचारियों के दुर्व्यवहार से परिचित है। वह भी इस घुटन भरे वातावरण से निकलकर शोषकों की जमात में शामिल होने के लिये यत्नशील है। उसे लाख समझाया जाये कि कृषि-कार्य राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा है, वह मानने को तैयार नहीं है। वह देखता है, सुनता है कि देश में किन कार्यों से लोग समर्थ-सशक्त और प्रभावशाली बनते हैं। समर्थ लोगों के लिये कोई कानून नहीं, केवल निर्बलों पर ही समस्त अंकुश है।
परन्तु, अब भी जो दृढ़-प्रतीज्ञ हैं, वे अपनी नीतियों का परित्याग नहीं करते। एक घटना है। एक राजकीय बस स्टेशन पर टिकट लेने के उद्देश्य से लाइन लगी थी । बड़ी लम्बी थी लाइन और भीड़ थी कि बढ़ती ही जा रही थी। कुछ समर्थजन लाईन तोड़कर खिड़की पर जा डटे। एक युवक ने इस कृत्य की निंदा की। लोगों ने सुझाव दिया, आप भी लाइन तोड़कर ले लीजिये टिकट। किन्तु युवक सिद्धान्तवादी था। अगले ही क्षणों में वह झपटकर लाइन-तोडकों को पीछे छकेलने लगा और व्यवस्था सुधर गई।

आज भी सदाचारियों, देशभक्तों की कमी नहीं है। आवश्यकता है उन्हें समुचित सम्मान दिया जाये। लोगों का यह भ्रम, विशेषकर युवा वर्ग का, मिटाया जाये कि मात्र धन के बल पर सब कुछ किया और कराया जा सकता है। गुण्डों की अपेक्षा सच्च्रित्र लोगों को बढ़ावा मिले तो कोई कारण नहीं कि युवा पीढी सम्मार्ग पर न आए। परन्तु यह सब औपचारिक नैतिक-शिक्षा और कोरे उपदेशों से कभी सम्भव न होगा। देश के उत्तरदायी व्यक्तियों को उच्चादर्श तो प्रस्तुत करने ही होंगे।

      
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